Tuesday, July 21, 2015

ताना बाना

मेरे ही मन का ताना बाना
मुझको समेटे बैठा है
वरना मैं कब का टूट कर
फर्श पर बिखरा होता...

सिमटा हूँ फैली दिशाओं में
बंधा हूँ लेकिन हवाओं में
मैं 'बहुत' हूँ तो ये हाल है
कैसा होता जो 'ज़रा' होता...

मैं बहता रहता पारे सा
और परस भी होता अनछुआ
यादों सा क़ैद ना हो पाता
ना वादों सा बिसरा होता...

Sunday, June 7, 2015

उमड़े तो हो बड़े शान से

उमड़े तो हो बड़े शान से,
बरसो तो जानें...
तपती ज़मीनों पे
बूँदें लुटाओ
भिगाओ तो माने.

तुम्हे अच्छा लगता है
तरसाना सबको
कि लोग तुम्हे देखें
बड़ी आस लेके
जताते हो अहसान,
बरसते हो जब भी
कभी यूँ ही प्यार
जताओ तो जानें.

देखे हैं बनते
कई रूप तुम्हारे
कि पहरों तुम्हे
ताके बैठे हैं हम भी
तुम्हे कितनी कसमों
से बाँधा है हमने
कोई वादा तुम भी
निभाओ तो जानें

Tuesday, May 5, 2015

कोशिशें जारी हैं

सुर्ख़ियों में कहानियाँ
अब भी तलाश करता हूँ
अजनबी सी गुफ्तगू
कर बंद आँखे सुनता हूँ
हासिल हुआ है कुछ नहीं
बस पलकें नींद से भारी हैं
माना कि पन्ने कोरे हैं
पर कोशिशें जारी हैं

कहता हूँ जब भी औरों से
मेरी छोड़ो, कुछ अपनी कहो
चाहता हूँ बातों में उनकी
कोई दास्ताँ छुपी तो हो
मैं जीत दूंढ़ता हूँ उनमें
पर हिम्मत सबने हारी हैं
माना कि पन्ने कोरे हैं
पर कोशिशें जारी हैं

ऐसा नहीं कि कहने को
मेरे पास कुछ भी नहीं
पर जो मैं कहना चाहूंगा
सुनना चाहेगा कोई नहीं
कहने को लाख हैं जेबों में
पर चंद सिक्कों की उधारी है
माना कि पन्ने कोरे हैं
पर कोशिशें जारी हैं

Saturday, March 14, 2015

अबके बार

रोक लूं तो शायद रुक भी जाओगे
अबके बार तुमको जाने नहीं देंगे...

यूँ तो आहटें तुम्हारी
हमने बहुत सम्हाली हैं
गुजरें कल की कितनी उलझन
आते कल पे टाली हैं.
कभी तो आके तुम इन्हें सुलझाओगे
अबके बार तुमको जाने नहीं देंगे...

फिर फिर आँखों में उठता है
सपना जाना पहचाना सा
फिर भी आज तुम्हारा क्यों है
मेरे कल से अनजाना सा
बैठ करीब ये भेद हमें समझाओगे
अबके बार तुमको जाने नहीं देंगे...

मैं हाथों की छाँव बना कर
दिन दिन भर तुमको देखूँगा
यादों का अलाव जला कर
बीते लम्हों को सेंकूंगा
जानता हूँ तुम ये आग बुझाओगे
अबके बार तुमको जाने नहीं देंगे...

मनस्वी

Wednesday, February 18, 2015

सुना है

सुना है अब तुम वहाँ नहीं रहती।

वो खिड़की के किवाड़ अब उस तरह
सुबह सुबह नहीं खुलते।
अब दबे पाँव सूरज सलाखों के
बीच से नहीं आ जाता।
अब वहाँ अलसाई सी
गुनगुनाहट सुनाई नहीं देती।
सुना है अब तुम वहाँ नहीं रहती।

बहुत दिनों से वो आँगन
भीगा नहीं है।
बिखरा था जो वो बुहारा नहीं है।
सोचा है जाऊंगा जब भी वहाँ
देख आऊंगा कुछ छूटा तो नहीं है।
पर चाह कर भी वहाँ जाने की
हिम्मत नहीं होती।
क्योंकि

सुना है अब तुम वहाँ नहीं रहती।

Wednesday, February 4, 2015

क्या होगा?

मत कहो मुझे इस कहानी का अंजाम क्या होगा?
कल सुबह खिलेगी कैसे और कल शाम क्या होगा?

मुझे खरीदने कितने लोग खड़े होंगे मेरे दर पर?
बिकने वाले मेरे ख़्वाबों का दाम क्या होगा?

मेरी नई पहचान मुझसे कितनी अनजानी होगी?
आईने में नज़र आने वाले का नाम क्या होगा?

कलम मेरी मुझसे कितने दिन रूठी और रहेगी?
उसे मनाने के सिवा मेरा और काम क्या होगा?


Sunday, December 28, 2014

My salute to 2014

ओ जाते साल जाते जाते इतना बताता जा
आने वाले साल की कोई झलक दिखाता जा

जो बोये थे सपने उन में अंकुर आएंगे या नहीं
जो सपने टूटेंगे उनकी खनक सुनाता जा

मैं लिखूंगा अपनी किस्मत जिन पन्नों पर स्याही से
बीते साल की रेखा उन पन्नों से मिटाता जा

मैंने दिल से माना है शुकर तेरे अहसानो का
तूने ज़ुल्म किये हैं तो अहसान जताता जा