Sunday, April 1, 2018

कुछ नया नया

कुछ नया नया
कुछ सुना सुना
इक गीत लबों पर आया था
कुछ बुझी बुझी
कुछ जली जली
यादों ने पल महकाया था

दो नाम जुड़े थे उस पल से
और आज सिले थे उस कल से
हम बुनते बैठे लमहों को
और कसते बैठे धागों को
कुछ रंगीला
कुछ बेरंगी
आँचल तुमको ओढ़ाया था

फिर शाम ढली फिर सुबह हुई
ज्यों दिन और रात में सुलह हुई
तुम जाते जाते रुकी ज़रा
मेरे चेहरे पर झुकी ज़रा
कुछ कहा नहीं
पर लगा मुझे
बस नाम मेरा दोहराया था
- Manasvi
19 March 2018

Friday, February 9, 2018

अलमारी में पीछे की तरफ़

अलमारी में पीछे की तरफ़
कुछ रखा था सम्हाल कर
आज सामने आया तो
कुछ यादें ताज़ा हो गयी

कुछ पल फिर से रंगीन हुए
मुस्कान हल्की सी खिल गयी
जैसे सपनो की ज़ंजीर को
एक टूटी कड़ी मिल गयी
बहुत दिनो से एक शिकन
माथे पर हक़ जमाए थी
चेहरे की रंगत सुर्ख़ हुई
तो शिकन भी कहीं खो गयी
भूली यादों के आले में
तस्वीर पुरानी संजो गयी

और इक दराज़ में रख दिया
फिर से उसे सम्हाल कर
सोयी इक धड़कन जगा कर वो
यादें दिल में कहीं सो गयी
- मनस्वी
27 jan 2018

Tuesday, November 14, 2017

याद नहीं

तुमसे कितना गहरा था
याराना याद नहीं
क्यों बिछड़ा था तुमसे
वो फ़साना याद नहीं

तुमको मनाने की सारी
कोशिशें याद हैं
तुमसे रूठ जाने का
बहाना याद नहीं

कभी तो हुआ था यूँ भी
गिले गिनाए थे सारे
दिल की बात कहते हुए
हिचकिचाना याद नहीं

रात गुज़ारी थी काँधे पे
सिर रख कर सुबकते हुए
पर गोदी में छुपा के सिर
सो जाना याद नहीं

कुछ तो था जो सही नहीं था
कुछ तो था जो अधूरा था
याद बहुत से पल हैं पर
ज़माना याद नहीं


14 Nov 2017

किसी दिन

किसी दिन
यूँ ही बिन बताए
बिना ख़बर बस आ जाना
दस्तक भी ना देना
एक चाबी तुम्हारे पास भी तो है
तुमने लौटाई कहाँ थी?
बस उस से घर खोल कर आ जाना
मैं तुम्हें देख कर हैरान नहीं होऊँगा
पूछूँगा भी नहीं कि कैसे आना हुआ?
बस अपनी कुर्सी जो बालकनी के
आड़े आती है, उसे हटा दूँगा...
तुम बाल्कनी में लगे मनी प्लांट से
कुछ बातें कर लेना
वो याद करता है तुम्हें
जब तुमने अपना समान समेटा था
उसे वहीं रहने दिया था
वो ग्रिल से उलझ जो गया था
उसने भी हटने की कोशिश नहीं की
सोचता था इसी बहाने तुम मिलने आ जाओगी
बहुत दिन हो गए हैं
उसे अफ़सोस होता है कि
वो क्यों उलझा रहा उन सलाखों से
मेरे साथ रहता है
मुझ सा ही सोचता है
उसे उम्मीद दे जाना
किसी दिन
यूँ ही बिन बताए
बिना ख़बर बस आ जाना

29 October 2017

उस रोज़

उस रोज़ कुछ पल और
तुम ठहर जाते तो
कहानी और होती
शायद...

मैं तुम्हें मना पाता
अपनी बात समझा पाता
शिकायतें मिट जाती
शायद...

जो होना है वो होता
उस मोड़ पर नहीं तो
अगले मोड़ पर बिछड़ते
शायद...

-27 October 2017

Wednesday, September 27, 2017

क्यों ना कुछ पल

क्यों ना कुछ पल 
कुछ ना कहें
बस ख़ामोशी में ढूँढ़े
मन में उमड़ें
कोलाहल की वजहें

यूँ ही मूँद के पलकों को
सपनो को गिरने से रोकें
धड़कन को क़ाबू ना करें
ना थामें, ना टोकें
दिल भर जाने दें थोड़ा
बूँदें बन आँखों से बहे

ख़ुद को समझाने की फ़िज़ूल 
कोशिश करना बंद करें
ख़ुद से पहले सुलह करें
ख़ुद को रज़ामंद करें
परत परत खुलती जायें
सुलझती जाएँ सब गिरहें

- 26 September 2017