Wednesday, February 4, 2015

क्या होगा?

मत कहो मुझे इस कहानी का अंजाम क्या होगा?
कल सुबह खिलेगी कैसे और कल शाम क्या होगा?

मुझे खरीदने कितने लोग खड़े होंगे मेरे दर पर?
बिकने वाले मेरे ख़्वाबों का दाम क्या होगा?

मेरी नई पहचान मुझसे कितनी अनजानी होगी?
आईने में नज़र आने वाले का नाम क्या होगा?

कलम मेरी मुझसे कितने दिन रूठी और रहेगी?
उसे मनाने के सिवा मेरा और काम क्या होगा?


Sunday, December 28, 2014

My salute to 2014

ओ जाते साल जाते जाते इतना बताता जा
आने वाले साल की कोई झलक दिखाता जा

जो बोये थे सपने उन में अंकुर आएंगे या नहीं
जो सपने टूटेंगे उनकी खनक सुनाता जा

मैं लिखूंगा अपनी किस्मत जिन पन्नों पर स्याही से
बीते साल की रेखा उन पन्नों से मिटाता जा

मैंने दिल से माना है शुकर तेरे अहसानो का
तूने ज़ुल्म किये हैं तो अहसान जताता जा

Sunday, November 16, 2014

तुम्हारी तस्वीर

तुम्हारी तस्वीर बनाते बनाते मैं रुक गया
आँखें बनाता था पर चाहता था
कि तस्वीर मेरी तरफ देखती

जाने क्यों तुम्हारी आँखें बार बार
मुझसे परे, दूर कहीं जाकर टिक जाती थी

सारी रात यूँ ही बीत गई
तुम उधर कैनवस पर
कहीं दूर देखती हुई...
मैं इधर पास में
बस तुम्हे देखता हुआ.

सुबह देखा तुम कैनवस पर नहीं थी.
शायद चली गई थीं.
वहीँ... जहां देख रही थीं.

माँगा था वो

माँगा था वो मिला नहीं
फिर भी मुझको गिला नहीं

कहने को अम्बर से आगे
अरमानों को लेकर भागे
सपने बैठ सिरहाने जागे
नींदों का सिलसिला नहीं

खुद से हारे सबसे जीते
बाहों पर तमगों को सीते
कितने मौसम बरसे बीते
फूल आस का खिला नहीं

यूँ तो सबका कहना माना
जाने क्या था मन को पाना
जंग जीत कर हमने जाना
जीतना था ये किला नहीं

Thursday, September 18, 2014

साँझ

साँझ की नहीं चाह मुझको दोपहर दे दो
बाँट दो अहसान सारे, मुझको कहर दे दो

दो घड़ी मुझको मेरे होने का यकीं आये
साथ ज़ख्मों के दवाओं का असर दे दो

मैं चलूँ इतना कि थक कर बैठना पड़े
रुकने की इतनी वजह मिले अगर, दे दो

लौट कर आना पड़े दोराहों पे बार बार
जो कहीं जाती ना हो, ऐसी डगर दे दो

Friday, September 12, 2014

पुराना एल्बम

आज मैं फिर एक पुराने एल्बम से गुज़रा
आज मैने भुलाए से कुछ पलों को जी देखा

रोक कर देखा सरकती वक़्त की सुइयों को भी
और फिर भी दो दफा उस घड़ी को सही देखा

चेहरों में तस्वीरों के मुस्कान बहुत सी पायी
पर उन माथों पर ठहरी शिकन को नहीं देखा

जब किसी अनजानी सी हँसी पर नज़र ठिठकी
बरसों बाद दिल को कहीं और होश कहीं देखा

Thursday, September 11, 2014

हम दोनों

हम दोनों कितनी ही देर,
अपने अपने दायरे में क़ैद,
बैठे रहे एक दूसरे के करीब,
मगर अजनबी से

बिखरे हुए पलों में से
चुनते रहे बस
एक दूसरे की गलतियां.
बुनते रहे शिकायतें
जो थी जिंदगी से.

मिल जाती थी नज़रें कभी कभी
छेड़ जाती थी होंठों पे मुस्कान हलकी
पर माथे की शिकन कह जाती थी
जो भूली सी चोटें थी गुज़रे कल की.

ये सफर शायद यूँ ही चले,
मंजिल... मिले ना मिले...
पर दायरे यही रहेंगे...
फासले यही रहेंगे...

जान पहचान होगी भी,
तो बस खुद की बेबसी से...